19 Apr 2016

भारत की मज़बूत कूटनीति से चीन हुआ बेचैन

नई दिल्ली : चीन के महान दार्शिनक लाओ त्जू ने कहा था कि किसी प्याले को ऊपर तक भरने की कोशिश की जाएगी तो वो छलक जाएगा और अगर किसी चाकू को लगातार घिसा जाएगा तो एक ना एक दिन उसकी धार कमज़ोर हो जाएगी लेकिन ऐसा लगता है कि शायद चीन अपने महान लोगों की बातें याद नहीं रखना चाहता तभी वो भारत से अपनी दुश्मनी का प्याला ऊपर तक भरने में लगा हुआ है।
भारत के रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर पहली बार चीन पहुंचे हैं, वो भारत और चीन के रिश्तों को बेहतर करना चाहते हैं, लेकिन लगता है कि चीन, ऐसा नहीं होने देना चाहता। चीन के सरकारी मीडिया से जुड़े अखबार ग्लोबल टाइम्स में भारत के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी की गई है। 


ग्लोबल टाइम्स में छपे एक लेख में भारत को एक ऐसी सुंदर महिला बताया गया है जो चाहती है कि अमेरिका और चीन जैसे देश उसे आकर्षित करें, इतना ही नहीं इस लेख में ये भी कहा गया है कि भारत अक्सर महाशक्तियों के बीच झूलता रहता है और इस वजह से भारत ज्यादा दूर तक नहीं जा पाएगा।

भारत के खिलाफ ऐसी टिप्पणी, इस बात का प्रमाण है कि चीन इस समय भारत की मज़बूत कूटनीति की वजह से बेचैन है। और भारत के बढ़ते प्रभाव को सह नहीं पा रहा है। अपनी मुहिम इंडिया फाइट्स बैक के तहत हम चीन की सरकारी मशीनरी और वहां के नियंत्रित मीडिया को आंकड़ों और सूचनाओं का आईना दिखाना चाहते हैं।

जब भी चीन की नज़र भारत और अमेरिका की मज़बूत दोस्ती पर पड़ती है तो उसकी छोटी-छोटी आंखें अपने आप बड़ी हो जाती हैं। भारत और अमेरिका के बीच जल्द ही, एक ऐसा समझौता हो सकता है जिससे एशिया में भारत की स्थिति बहुत मज़बूत हो सकती है। इस समझौते के बाद नाटो यानी द नार्थ अटलांटिक ट्रीटी ऑर्गनाइजेशन का हिस्सा ना होने के बावजूद हिंद महासागर और साउथ चाइना सी में भारत, अमेरिका का एक बड़ा कूटनीतिक पार्टनर बन जाएगा और इसी वजह से चीन परेशान है।

पिछले हफ्ते अमेरिका के रक्षा मंत्री एश्टन कार्टर जब भारत के दौरे पर आए तो भारत और अमेरिका सैद्धांतिक तौर पर एलएसए यानी लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट पर राज़ी हो गए थे। भारत और अमेरिका अगले कुछ महीनों में लॉजिस्टिक सपोर्ट एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर कर सकते हैं, ये अमेरिका और भारत के बीच एक ऐतिहासिक समझौता होगा, क्योंकि एलएसए पर हस्ताक्षर होने के बाद अमेरिका, भारत के मिलिट्री बेस और भारत, अमेरिका के मिलिट्री बेस को इस्तेमाल कर पाएगा। इस समझौते में मिलिट्री बेसेज पर मौजूद सभी तरह के लॉजिस्टिक सपोर्ट का इस्तेमाल किया जा सकेगा और विमानों में ईंधन भी भरा जा सकेगा। 

भारत और अमेरिका के बीच होने वाला ये समझौता वैसा ही होगा जैसा अमेरिका और नाटो के दूसरे देशों के बीच है। आपको बता दें कि नाटो में शामिल देश एसीएसए यानी एक्वीजिशन एंड क्रॉस सर्विंग एग्रीमेंट के तहत एक दूसरे के मिलिट्री बेस का इस्तेमाल कर पाते हैं। इस वक़्त नाटो में 28 देश शामिल हैं।

ऐसा पहली बार होगा जब भारत, अमेरिका जैसी महाशक्ति के साथ, इस तरह का सैन्य गठबंधन करेगा। भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने 1953 में गुट निरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी। गुट निरपेक्षता का मतलब है किसी भी गुट का हिस्सा ना बनने का फैसला और इसी गुटनिरपेक्षता को भारत और चीन की दोस्ती का आधार बनाया गया था। ये भारत और चीन के पंचशील सिद्धांतों के तहत आता है। इन सिद्धांतों के मुताबिक भारत और चीन को एक दूसरे की संप्रभुत्ता को सम्मान देना था, एक दूसरे के खिलाफ आक्रमक नहीं होना था, एक दूसरे के घरेलू मामलों में दखल नहीं देना था, समानता की बात करनी थी और शांतिपूर्ण तरीके से एक दूसरे के अस्तित्व को स्वीकार करना था, लेकिन 1962 में चीन ने पंचशील सिद्धांतों की धज्जियां उड़ाते हुए भारत पर हमला कर दिया था।

यानी पंडित जवाहर लाल नेहरू चीन की चालाकी को वक्त रहते समझ नहीं पाए, लेकिन अब 54 वर्षों बाद भारत अपनी गलतियों से सबक लेते हुए चीन को घेरने की रणनीति पर तेज़ी से काम कर रहा है। विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की ईरान यात्रा के दौरान चाबहार बंदरगाह के निर्माण में तेज़ी लाने पर सहमति बनी है। भारत, ईरान और पाकिस्तान की सीमा के पास बन रहे इस बंदरगाह के निर्माण के लिए 150 मिलियन डॉलर्स यानी करीब 1 हज़ार करोड़ रुपये का कर्ज़ ईरान को दे रहा है, ये बंदरगाह पाकिस्तान में चीन द्वारा बनाए जा रहे ग्वादर बंदरगाह का जवाब है। ईरान पर अंतर्ऱाष्ट्रीय प्रतिबंध हटाए जाने के बाद अब इस बंदरगाह का निर्माण बहुत तेज़ी से होगा और ये बात चीन के गले नहीं उतर रही है, क्योंकि पाकिस्तान नाम के जिस कूटनीतिक चाकू का इस्तेमाल वो भारत को घायल करने के लिए करता रहा है, उस चाकू की धार को भारत और ईरान की दोस्ती ने अब कमज़ोर कर दिया है


भारत और अमेरिका के मजबूत रिश्तों को देखकर पाकिस्तान भी हिचकियां ले रहा है। कुछ दिन पहले चीन ने संयुक्त राष्ट्र में आतंकी मसूद अज़हर को प्रतिबंधित करने के भारत के प्रस्ताव के खिलाफ वीटो कर दिया था यानी संयुक्त राष्ट्र में अपनी शक्ति का इस्तेमाल करके भारत के प्रस्ताव को गिरा दिया था। ऐसा करके चीन ने पाकिस्तान और आतंकवादियों के प्रति अपने प्रेम का प्रदर्शन किया था। लेकिन भारत ने मॉस्को में इसका कड़ा विरोध किया है। ज़ाहिर है चीन को भारत की तरफ से लगातार कूटनीतिक पंच पड़ रहे हैं।


इसलिए अपनी सरकारी मीडिया मशीनरी के ज़रिए चीन, अब भारत को दो महाशक्तियों के बीच झूलने वाला देश बता रहा है, लेकिन चीन ये भूल गया है कि जब सितंबर 2014 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग भारत आए तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अहमदाबाद में साबरमती नदी के किनारे जिनपिंग को झूला झुलाया था, और चीन के साथ रिश्ते बेहतर करने की कोशिश की थी। 

हालांकि अब भारत के बढ़ते कदम देखकर चीन को चक्कर आ रहे हैं और वो भारत को बदनाम करने वाली खट्टी-मीट्ठी गोलियां खाकर अपना हाज़मा दुरुस्त करने की कोशिश कर रहा है।

SOURCE - ZEE

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