जमीन से जुड़े हालात: सिर्फ रिकॉर्ड सुधर जाएं तो 30 लाख केस खत्म हो जाएंगे

जमीन से जुड़े हालात: सिर्फ रिकॉर्ड सुधर जाएं तो 30 लाख केस खत्म हो जाएंगे
श्रीगंगानगर.दिल्ली से सटी नवीन नगर सोसायटी में 1835 लोग 17 साल से अपने प्लॉट के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यहां उनकी जमीनों पर भूमाफिया का कब्जा है। जमीन का हक पाने के लिए एक युवक यशपाल तो पिछले 814 दिन से मिनी सचिवालय के सामने धरने पर है। राजस्थान के श्रीगंगानगर में जमीन के लिए भाई-बहनों, जेठानी-देवरानी और सास-बहू के बीच 2000 से ज्यादा केस चल रहे हैं। अहमदाबाद के ओगणज गांव में आधी सदी से तीन पीढ़ियां 12 हजार वर्गफीट जमीन के लिए कानूनी लड़ाई लड़ रही है। देश में पेंडिंग 73 लाख सिविल मुकदमों में 66% जमीन से जुड़े हैं। एक्सपर्ट्स कहते हैं कि अगर जमीन प्रक्रिया और रिकॉर्ड सुधर जाए तो अदालतों से 60% तक यानी करीब 30 लाख केस खत्म हो सकते हैं। सर्वे से सामने आई हकीकत...

- यह सिर्फ तीन मामले नहीं है, जमीनों से जुड़ा सबसे बड़ा सच है। देश में सबसे ज्यादा मुकदमे जमीनों के ही हैं, सबसे पुराना मुकदमा भी जमीन का है।
-‘दक्ष’ सर्वे के मुताबिक, जमीनी रिकॉर्ड सही करने के लिए केंद्र पिछले 28 साल में तीन बार प्रोग्राम लॉन्च कर चुका है।
- लेकिन कई राज्य सरकारों ने तो फंड की आधी राशि भी इस्तेमाल नहीं की।

52 साल-3 पीढ़ियां और एक रुका हुआ फैसला

सबसे पुराना केस जमीन का, सबसे ज्यादा केस भी

- दोषीपुरा कोर्ट केस:देश का सबसे पुराना केस 1878 में कब्रिस्तान की दो एकड़ जमीन को लेकर शिया और सुन्नी के बीच शुरू हुआ था। 1981 में सुप्रीम कोर्ट फैसला दे चुका है, लेकिन लागू नहीं हो पाया।

भास्कर के गिरिराज अग्रवाल की केंद्रीय ग्रामीण विकास मंत्री चौधरी बीरेन्द्र सिंह से बातचीत

इसरो से हर इंच जमीन का रिकॉर्ड तैयार करवाएंगे

- सरकार के पास अपनी ही जमीन का पूरा रिकॉर्ड क्यों नहीं?
बीरेंद्र सिंह: अलग-अलग डिपार्टमेंट हैं। इसलिए एक जगह जानकारी नहीं है।

- अहम प्रोजेक्ट अटके हैं, क्या करेंगे?
अभी 2013 का एक्ट लागू है। हमारा एक्ट ज्वाइंट कमेटी के पास है। कमेटी रिपोर्ट देगी, तब सोचेंगे क्या करना है।

- जमीनों का मामला एक ही विभाग या मंत्रालय क्यों नहीं देखता?
होना यही चाहिए, लेकिन 13 ऐसे एक्ट हैं, जिनके तहत अलग-अलग मंत्रालय जमीनों का मैनेजमेंट करते हैं।

- लाखों मामले पेंडिंग हैं?
हम नया एक्ट लेकर आए थे, लेकिन उसका कांग्रेस और दूसरी पार्टियों ने विरोध कर दिया।

- जमीनों को लेकर नया क्या किया?
इसरो से सैटेलाइट मैपिंग करवा रहे हैं। एक-एक इंच जमीन का हिसाब रखेंगे।

भास्कर एक्सपर्ट: जानिए कैसे निकल सकता है समाधान

...तो 60% जमीनों के मामले अदालतों से खत्म हो जाएंगे

1. रिकॉर्ड सुधर जाए और समान प्रक्रिया बन जाए तो 60% जमीन संबंधी मुकदमे कम हो सकते हैं। फास्ट ट्रेक कोर्ट भी बनाने चाहिए। - राजागोपाल पी.वी, नेशनल लैंड रिफॉर्म्स काउंसिल के सदस्य

2. प्रक्रिया सरल हो जाए तो आधे मामले घट जाएंगे
35% मामले अवैध कब्जे के होते हैं जिनमें किराएदारी विवाद भी हैं । प्रक्रिया सरल हो तो 50% जमीनी विवाद कम हो जाएंगे, क्योंकि अधिकतर में सरकार ही पार्टी है। - मुकेश आनंद, सुप्रीम कोर्ट के वकील

देश में जमीनी झगड़ों के कारण 4.21 लाख करोड़ के 65 प्रोजेक्ट्स अटके हुए हैं। इतना ही नहीं, हाउसिंग के 78% प्रोजेक्ट तय वक्त से 10 साल तक देरी से चल रहे हैं। इसी वजह से सिर्फ 7 शहरों में ही 15 लाख लोगों को घर नहीं मिल पा रहा है। 65 प्रोजेक्ट्स की वजह से ही करीब 1 करोड़ नौकरियां अटकी हैं। 414 हाईवेज पर काम नहीं हो पा रहा है। एक अनुमान के मुताबिक, अलग-अलग लेवल पर 3 करोड़ नौकरियां सिर्फ इसलिए फंसी हैं, क्योंकि जमीन से जुड़ी मंजूरी नहीं मिल पा ही है। इतना ही नहीं, शहरों में एक करोड़ से ज्यादा घर खाली पड़े हैं, पर आधे शहरी लोगों के खुद के घर नहीं हैं। सरकार को नहीं पता कि उसके पास कुल कितनी जमीन...
- जमीन हमारा जीवन स्तर ऊंचा उठाने वाले हर तरीके पर असर डाल रही है। नेशनल लैंड रिफॉर्म्स काउंसिल के मेंबर और यूनिटी काउंसिल के चीफ राजागोपाल पी.वी. ने भास्करको बताया कि फॉरेस्ट और रेवेन्यू डिपार्टमेंट में फंसी 45 लाख एकड़ जमीन विवादों से बाहर आए तो ‘सब के लिए घर’ जैसे 9 प्रोग्राम चलाए जा सकते हैं।
- खुद सरकार को नहीं पता कि उसके पास कुल कितनी जमीन है।
- जमीन की यह स्थिति कमोबेश हर राज्य में है।
- जमीन से जुड़े दर्जनों कानून और 10 से ज्यादा मंत्रालय होने के बावजूद जमीन की जानकारी देश में कहीं भी एक प्लैटफॉर्म पर नहीं है।
- मिस मैनेजमेंट इस उदाहरण से भी समझा जा सकता है कि देश में 30 एयरपोर्ट्स/एयरस्ट्रिप ऐसे हैं, जो बनने के बाद कभी भी इस्तेमाल नहीं किए गए।
- इतना ही नहीं, देश के आधे शहरियों के पास घर नहीं हैं, जबकि देश में 1.10 करोड़ घर खाली पड़े हैं।
जमीन में छिपा है काला धन
- जमीन की खरीद-फरोख्त में 50% तक नकद का इस्तेमाल होता है। पंजाब विजिलेंस ब्यूरो की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ब्लैक मनी उस जमीन में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होती है जो किसान से खरीदी जा रही है, क्योंकि किसान नकद लेन-देन ही पसंद करता है।
- असली खरीददार तो पर्दे के पीछे ही रहते हैं। 35% सौदों में काला धन राजनेता ही लगाते हैं। इसके बाद एनआरआई और फिर ब्यूरोक्रेट्स और बिल्डर्स का नंबर आता है। जमीन के कलेक्टर रेट व वास्तविक रेट में अंतर होता है।
- काला धन खपाने वाले कलेक्टर रेट पर तो जमीन की रजिस्ट्री करा देते है। बाकी की कीमत नकद दे देते हैं।
- इससे एक तो वह स्टाम्प ड्यूटी बचा लेता है, दूसरा ब्लैक मनी को बाजार में उतार देता है।
फैक्ट फाइल
- 60,000 हेक्टेयर जमीन लेकर भी 7% रोजगार ही दे पाए।
- सेज हाउसिंग के 78% प्रोजेक्ट लेट, बुकिंग के 10 साल बाद भी 15 लाख लोगों को घर नहीं। 8% इंडस्ट्रियल प्रोजेक्ट्स जमीन अधिग्रहण की वजह से अटके हैं।
- पिछले तीन साल में 2500 वर्गकिमी घना जंगल खत्म हो गया, उद्योगों ने छीना 14 हजार वर्गकिमी. जंगल, अतिक्रमण ने 15 हजार 23,716 वर्गकिमी जंगल छीना।
SOURCE - BHASKER

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