पढ़ें, रितिक की फिल्म 'मोहनजोदड़ो' का MOVIE REVIEW

पढ़ें, रितिक की फिल्म 'मोहनजोदड़ो' का MOVIE REVIEW
कुछ दिन पहले किसी ने चुटकी लेते हुए कहा कि रितिक रोशन और आशुतोष गोवारिकर में एक बात समान है। दोनों ही बहुत कम फिल्में करते हैं। इतनी कम कि दर्शकों को इनकी पिछली फिल्म याद करने में या तो पेशानी पर बल देना पड़ता है या फिर गूगल बाबा की सहायता लेनी पड़ती है। रितिक रोशन की अंतिम फिल्म साल 2014 अक्तूबर माह में आई थी, ‘बैंग बैंग’। और गोवारिकर की अंतिम निर्देशित फिल्म साल 2010 में आई थी, ‘खेलें हम जी जान से’।
आखिर ये दोनों ही इतनी कम फिल्में क्यों करते हैं? रितिक बहुत चूजी हैं, समझ आता है। लेकिन आशुतोष? उनका कम फिल्में बनाने के पीछे तर्क है कि उनकी फिल्मों में शोध-अध्ययन बहुत होता है। वो हर एक चीज पर बात पर बहुत बारीकी से काम करते हैं। और यही बात उन्हें एक ब्रांड के रूप में स्थापित करती है। लेकिन क्या ब्रांड गोवारिकर इस बार भी कुछ ऐसा लाया है, जिसे देख ‘लगान’ और ‘जोधा अकबर’ की याद और कामयाबी दोहराई जा सकती है। देखते हैं...

ये कहानी है हजारों साल पुरानी प्राचीन सभ्यता मोहनजो दारो की। एक ऐसा शहर जो रातों सिंधु नदी के पानी में समा गया था। इतिहास में इसकी अनेक कथाएं-गाथाएं हैं। लेकिन उस रात से पहले वहां क्या हुआ था। ऐसा क्या हुआ जो नदी का उफान बांध भी नहीं रोक सका और पूरी नगरी जगमग्न हो गई थी। ये फिल्म उससे पहले की कथा बयां करती है।

आमरी गांव का एक युवा सरमन (रितिक रोशन) मोहेंजो दारो जाना चाहता है। वह एक किसान परिवार से है, जो नील बोते हैं। उसका काका दुरजन (नितिश भारद्वाज) उसे वहां जाने से मना करता रहता है, लेकिन जब सरमन जिद पर अड़ जाता है तो वह उसे कुछ हिदायतों के साथ वहां जाने देता है। मोहेंजो दारो पहुंच कर सरमन की नजर चानी (पूजा हेगड़े) पर पड़ती है, जो वहां के सबसे बड़े पुजारी (मनीष चौधरी) की बेटी है।

मोहेंजो दारो में प्रधान माहम (कबीर बेदी) का राज चलता है, जिसने पूरी विराट सभा (मंत्री परिषद्) को अपने कब्जे में कर रखा है। उसका बेटा मुंजा (अरुणोदय सिंह) वहां की प्रजा और व्यपारियों से मनमाने ढंग से खरीददारी करता है और कर वसूलता है। यहां आकर सरमन को सब अजीब लगता है। यहां उसकी दोस्ती एक सिपाही लोथार (दिगांता हजारिका) से हो जाती है, जो उसे इस नए नगर की बातों से परिचित करवाता है। लोथार, सरमन को बताता है कि चानी को सिंधु मैया का आर्शीवाद प्राप्त है, इसलिए सभी लोग उसके आगे सिर झुकाते हैं।

सरमन को चानी से प्यार हो जाता है और जब उसे पता चलता है कि मुंजो, चानी से जबरदस्ती ब्याह रचाना चाहता है तो वह विद्रोही हो जाता है। ये बात जब माहम तो पता चलती है तो वह सरमन को मृत्युदंड की सजा सुना देता है, लेकिन पुजारी के कहने पर वह इस सजा को एक खतरनाक खेल में तब्दील कर देता है। सरमन इस खतरनाक खेल की खर्त को स्वीकार कर लेता है और अपनी जीत के बदले में चानी का हाथ माहम से मांग लेता है। माहम मान जाता है और यहां भी एक चाल खेल जाता है, क्योंकि उसे पक्का विश्वास है कि सरमन इस खेल में नहीं जीत सकता।

इस खतरनाक खेल में जीत के बाद सरमन मोहेंजो दारो के लोगों के दिलों में बस जाता है और पुजारी उसका मेल चानी से कराने के लिए राजी हो जाता है। इसी बीच पुजारी को ये भी पता चल जाता है कि सरमन दरअसल सुरजन (शरद केलकर) का बेटा है, जिसने बरसों पहले माहम के अत्याचारों के खिलाफ आवाज उठाई थी।

सबसे पहली बात ये कि यहां जिस तरह की सहज भाषा के साथ इस फिल्म की कहानी को बयां किया गया है, उतनी सहजता से उसे फिल्म में नहीं दिखाया गया है। दरअसल गोवारिकर ने हिन्दी के उन शब्दों का प्रयोग किया है, जो उस समय बोले जाते थे, इसलिए फिल्म देखते समय कई बातें आपको अटपटी-सी लग सकती है। या कहिये आज के दौर में थोड़ी-सी अव्यवाहरिक लग सकती हैं। हालांकि तकनीकी रूप से यह गलत कहीं से भी नहीं लगती। दूसरी बात ये कि ऐसा लगता है कि निर्देशक ने अपनी पूरी तवज्जो शोध-अध्ययन पर ही केन्द्रित रखी है, इसलिए फिल्म में मनोरंजन पक्ष थोड़ा कमजोर रह गया है। कई जगहों पर तो काफी कमजोर रह गया है।
स्टारकास्ट के नाम पर केवल रितिक ही हैं, जो आकर्षित कर पाते हैं। कबीर बेदी काफी लंबे समय से कुछ नया नहीं कर पा रहे हैं। माहम के रोल के लिए किसी और को भी लिया जा सकता था।

सरमन और माहम फिल्म के दो अहम और मजबूत किरदार हैं, जिसमें माहम प्रभावी नहीं लगता। इसी तरह से पूजा हेगड़े एक मोम की गुड़िया की तरह लगती हैं, जिसके चेहरे पर भाव ही नहीं आते। चानी के किरदार के लिए एक चमकते चेहरे के साथ एक कलाकार की भी जरूरत खटकती है। चानी की पोशाक उसे अरेबियन नाईट डांसर का लुक देती है। आखिर ये किरदार कुछ ‘दिखाने’ पर क्यों उतारू नजर आता है। मोहेंजो दारो में जब बाकी महिला किरदार सामान्य हैं तो फिर चानी ही अलग क्यों। क्या उसे कुछ दिखाने का भी आर्शीवाद प्राप्त है?

अरुणोदय सिंह ठीक लगे हैं, लेकिन उनके करने के लिए कुछ ज्यादा था ही नहीं। शरद केलकर और नरेद्र झा जैसे किरदार सस्ते में निपटा दिए गये। सरमन के दोस्त का किरदार और लोथान का किरदार और मजेदार एवं जोशीला हो सकता था। रितिक को छोड़ कर हर किरदार आधा-अधूरा और लगभग अपरिपक्व सा लगता है। अब आप समझ सकते हैं कि अकेले रितिक के कंधों पर इस फिल्म की कितनी जिम्मेदारी रही होगी।

ये फिल्म सिर्फ और सिर्फ अपने कान्सेप्ट की वजह से आकर्षित करती है। ये देखना रोचक लगता है कि लोग घोड़े को देख कर क्यों हैरान हुए। तब मुद्रा नहीं चलती थी। चीजों की खरीद-फरोख्त चीजों के अदले-बदले से होती थी। ग्रामीणों ने जब एक मंजिला-दुमंजिला मकान देखे तो वो हौरान क्यों हुए। ऐसी कई बातें हैं, जो फिल्म में आकर्षित भी करती हैं और बांधे भी रखती है। लेकिन इसी क्रम में कई और बातें भी हैं, जो अखरती हैं। स्पेशल इफेक्ट्स और वीएफएक्स इनमें से एक है। ये सब प्रभाव देखने में अच्छे तो लगते हैं, लेकिन इनका तकनीकी स्तर बहुत खास नहीं है, सामान्य है। इसी तरह से रहमान का संगीत और जावेद साहब की कलम से निकले गीत बेहद सामान्य से हैं। संगीत में जरा भी थिरकन नहीं है। लगता नहीं कि इसी निर्देशक की देख-रेख में ‘लगान’, ‘स्वदेस’ और ‘जोधा अकबर’ का संगीत तैयार हुआ था।

कुल मिला कर 100 करोड़ रु. की लागत वाली ‘मोहेंजो दारो’ अपने शिल्प की वजह से ध्यान खींचती है। माहौल की वजह से बांधती है। रितिक रोशन की मौजूदगी की वजह से आकर्षित करती है। लेकिन बहुत सारी बातों की वजह से यह एक ठोस मनोरंजक फिल्म नहीं बन पाती। इसमें ‘जोधा अकबर’ जैसी भव्यता-चमक और बांधे रखने वाली कहानी नहीं है। धूल मिट्टी तो ‘लगान’ में भी बहुत थी, लेकिन उसमें अलग ही बात थी। हालांकि गोवारिकर ने सिनेमाई स्वतंत्रता से खिलवाड़ नहीं किया है, लेकिन अगर वह थोड़ी स्वतंत्रता ले भी लेते तो मजा बढ़ जाता। फिर भी गोवारिकर के इस प्रयास की सराहना तो बनती है कि उन्होंने इस विषय पर फिल्म बनाने का जोखिम तो उठाया। इसी तरह के जोखिम सिनेमा में नई बातों और इसे जिंदा रखने के लिए जाने जाते रहे हैं।
कलाकार: रितिक रोशन, पूजा हेगड़े, कबीर बेदी, अरुणोदय सिंह, नितिश भारद्वाज, मनीष चौधरी, नरेन्द्र झा, शरद केलकर, सुहासिनि मुले, दिगांता हजारिका
निर्देशक-लेखक-पटकथा: आशुतोष गोवारिकर
निर्माता: सुनीता गोवारिकर, सिद्धार्थ राय कपूर
संगीत: ए. आर. रहमान
संवाद : प्रीति ममगैन
गीत: जावेद अख्तर
रेटिंग 2.5 स्टार
Source - live hindustan

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